
पंचेव अत्थिकाया छज्जीवणिकाए दव्वमण्णं य ।
आणगब्भे भावे आणाविचएण विचिणादि॥1720॥
पाँचों अस्तिकाय षट् जीवनिकाय और कालादिक भी ।
जिन-आज्ञा अनुसार विचारे, जानो आज्ञा-विचय यही॥1720॥
अन्वयार्थ : पंच अस्तिकाय - जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश - इनको अस्तिकाय कहते हैं और उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य - इन तीन परिणति से युक्त होना है, वह अस्ति है, उसे ही सत् कहते हैं । जिसमें उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य नहीं, वह सत् नहीं । समस्त वस्तुएँ सर्वथा नित्य नहीं हैं, सर्वथा क्षणिक नहीं हैं । सर्वथा नित्य वस्तु के अनुक्रम से वर्तती वह पर्याय, उसके अभाव से विकारवानपने का अभाव होगा - परिणतिरहित होगा और यदि सर्वथा क्षणिकविनाशीक ही मानते हैं तो प्रत्यभिज्ञान का अभाव होता है । यह वस्तु वही है, ऐसा कहना नहीं बनेगा । किसी को बालक अवस्था में देखा था, उसे ही दश वर्ष के बाद देखा, तब जाना कि - "इसे दश वर्ष पहले बाल्यावस्था में देखा था, वही यह है ।" क्षणविनाशीक में ऐसा प्रत्यभिज्ञान नहीं हो सकता । इसलिए प्रत्यभिज्ञान का कारण कोई स्वरूप से ध्रौव्यपना का अवलम्बन करता है और पर्यायें क्रम से प्रवर्तती हैं । उसका विनाश और उत्पाद एक समय में होता है । ऐसे एक समय में उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य - तीन परिणति को धारण करने वाली वस्तु को 'सत्' ऐसा जानना योग्य है । जैसे घट पर्याय का नाश होना, वही कपाल पर्याय का उत्पाद हैऔर कपाल का उत्पाद होना, वही घट पर्याय का नाश है । मृतिका दोनों पर्यायों में ध्रुव है । इसलिए घट के नाश होने का तथा मिट्टी की ध्रुवता का भिन्न काल नहीं है । घट में समय-समय सूक्ष्म परिणति उत्पन्न होती है और नष्ट होती है और मृतिका से ध्रौव्य है । यदि पर्यायार्थिकनय से भी उत्पाद-विनाश न हो तो नवीन घट था, वह पुराना कैसे होगा? इसलिए अर्थपर्याय का तो समय-समय में उत्पाद-विनाश होता है और व्यंजनपर्याय जो स्थूलपर्याय है, वह बहुत समय में विनशती है । जैसे घट पर्याय वह व्यंजनपर्याय है, वह बहुत समय के बाद नाश होती है; परन्तु घट की अर्थपर्याय तो प्रति समय उपजतीविनशती है । जैसे मनुष्यपर्याय वह तो व्यंजन पर्याय है, वह आयुपर्यंत एक ही रहती है और अर्थपर्याय प्रतिसमय भिन्न-भिन्न उपजती है, निरन्तर असंख्यात उत्पन्न होहो कर विनशती हैं और द्रव्य ध्रुव रहता है । अत: जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश - इन पाँचों द्रव्यों में उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य है; इसलिए इन्हें 'अस्ति' कहते हैं । जिसके बहुत प्रदेश होते हैं, उसे काय कहते हैं । एक जीव के असंख्यात प्रदेश हैं और पुद्गलद्रव्य संख्यात, असंख्यात और अनंत प्रदेशों को धारण करता है । धर्मद्रव्य और अधर्मद्रव्य के असंख्यात-असंख्यात प्रदेश हैं । आकाश के अनंत प्रदेश हैं । बहुप्रदेशी को काय कहते हैं । जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश - ये बहुप्रदेशी हैं, इसलिए इन्हें अस्तिकाय कहते हैं । इनके उत्पाद, व्यय, ध्रौव्यपने के कारण अस्तिपना है और बहुप्रदेशी के कारण कायपना है, इसलिए इन्हें अस्तिकाय कहते हैं और कालाणुओं के उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यता के कारण अस्तिपना तो है, परन्तु बहुप्रदेश न होने से कायपना नहीं । अस्तिपने के कारण काल को द्रव्य तो कहा है, परन्तु काय नहीं कहा । जो अपने-अपने गुण-पर्यायों को प्रतिसमय प्राप्त हों, उन्हें द्रव्य कहते हैं और जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश, काल - ये छहों ही द्रव्य प्रति समय एक परिणति को छोडते हैं और नवीन पर्याय ग्रहण करते हैं और द्रव्य से ध्रौव्य रहते हैं, इसलिए इन्हें द्रव्य कहते हैं । कालद्रव्य एकप्रदेशी होने से काय नहीं है, अत: द्रव्य तो छह प्रकार के हैं और अस्तिकाय पाँच ही हैं । इनको भगवान सर्वज्ञ वीतराग की आज्ञानुसार चिंतवन करना इसे "आज्ञाविचय" धर्मध्यान कहते हैं । पृथ्वी ही है काय जिनके ऐसे पृथ्वीकाय, जल ही है काय जिसके ऐसे जलकाय, अग्नि ही है काय जिनके, ऐसे अग्निकाय जीव, पवन ही है काय जिनके ऐसे पवनकाय जीव और वनस्पति ही है काय जिनके, वह वनस्पतिकाय - ये पाँच तो स्थावर, द्वीन्द्रिय, त्रींद्रिय, चतुरिन्द्रिय, पंचेन्द्रिय, इन्हें त्रस कहते हैं । इन छहों कायों में जीव हैं - ऐसा जिनेन्द्र ने देखा है, इसलिए जीवों के छह काय और जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश, काल - ये षड्द्रव्य हैं । ये सर्वज्ञ की आज्ञा से ग्रहण करने योग्य हैं, ऐसा 'आज्ञाविचय' धर्मध्यान में चिंतवन करो ।
सदासुखदासजी