
कल्लापावगाणउपाये विचिणादि जिणमदहमुवेच्च ।
विचिणादि वा अवाए जीवाण सुभे य असुभे य॥1721॥
जिनवाणी में कहे आत्म-कल्याण मार्ग का करे विचार ।
कैसे कर्म शुभाशुभ क्षय हों - यह विचार है विचय-अपाय॥1721॥
अन्वयार्थ : जिनेन्द्र के मत को प्राप्त होकर अपने कल्याण करने के उपायों का चिंतवन करना, वह अपायविचय धर्मध्यान है ।
सदासुखदासजी