
एयाणेयभवगदं जीवाण पुण्णपावकम्मफलं ।
उदओदीरणसंकमबंधे मोक्खं च विचिणादि॥1722॥
इस भव अथवा विगतभवों के पुण्य-पाप कमाब का फल ।
उदय-संक्रमण बन्ध-मोह का हो विचार विपाक-विचय॥1722॥
अन्वयार्थ : विपाकविचय धर्मध्यान में जीवों के एकभव में तथा अनेक भवों में प्राप्त हुए पुण्य-पाप कर्म का फल तथा उदय, उदीरणा, संक्रमण, बन्ध, मोक्ष - इनका चिंतवन करना ।
सदासुखदासजी