अहतिरियउढ्ढलोए विचिणादि सपज्जए ससंठाणे ।
एत्थे व अणुगदाओ अणुपेहाओ वि विचिणादि॥1723॥
तीन लोक का भेद और संस्थान सहित चिन्तन करना ।
अनुप्रेक्षाओं का विचार भी है संस्थान विचार कहा॥1723॥
अन्वयार्थ : संस्थानविचयधर्मध्यान में अधोलोक, तिर्यग्लोक, ऊर्ध्वलोक पर्यायों सहित तथा संस्थानसहित का चिंतवन करना और संस्थानविचय धर्मध्यान में ही द्वादश भावना का चिंतवन करना ।

  सदासुखदासजी