
अद्धुवमसरणमेगत्तमण्ण संसारलोयमसुइत्तं ।
आसवसंवरणिज्जर धम्मं बोधिं च चिंतिज्ज॥1724॥
अधु्रव अशरण एक अन्य संसार लोक अरु अशुचि स्वरूप ।
आस्रव संवर धर्म निर्जरा दुर्लभ-बोधि भावनारूप॥1724॥
अन्वयार्थ : 1 अध्रुव, 2 अशरण, 3 एकत्व, 4 अन्यत्व, 5 संसार, 6 लोक, 7 अशुचित्व, 8 आस्रव, 9 संवर, 10 निर्जरा, 11 धर्म, 12 बोधि - इन द्वादश भावनाओं का बारम्बार चिन्तवन करो ।
सदासुखदासजी