विज्जूव चंचलाइं दिट्ठपणट्ठाईं सव्वसोक्खाइं ।
जलबुब्बुदोव्व अधुवाणि हुंति सव्वाणि ठाणाणि॥1726॥
विद्युत-सम चंचल इन्द्रिय-सुख पलक झपकते होते नष्ट ।
सुरपति नरपति आदि सभी पद जल बुदबुद-सम होंय विनष्ट॥1726॥
अन्वयार्थ : सभी इन्द्रियजनित सौख्य बिजलीवत् चंचल हैं । जैसे बिजली पहले दिखाई देती है और नष्ट हो जाती है, फिर नहीं दिखती । तैसे ही इन्द्रियों के विषयजनित सुख नष्ट होने के बाद दिखाई नहीं देते । सभी ग्राम, नगर, गृह, मकान, जल के बुदबुदे समान अस्थिर हैं । इसलिए यह मेरा स्थान है, यह मेरा गृह है, मैं यहाँ बसता हूँ, ये मेरे विषय हैं, इन्द्रिय हैं, ऐसा संकल्प मत करो । इन्द्रपना, चक्रीपना आदि सभी विनाशीक जानकर अपने ज्ञानदश र्न स्वरूप में अपनापन धारण करो ।

  सदासुखदासजी