णावागदाव बहुगइपधाविदा हुंति सव्वसंबंधी ।
सव्वेसिमासया वि अणिच्चा जह अब्भसंघाया॥1727॥
नौका में एकत्रित जनवत् मात-पिता सम्बन्धी जन ।
अपनी-अपनी गति में जाते मेघ पटलवत् अहो अनित्य॥1727॥
अन्वयार्थ : समस्त संबंध कैसे हैं? जैसे एक नाव में अनेक देश, अनेक ग्राम के व्यक्ति इकट्ठे होकर बैठ जाते हैं और नाव किनारे पर पहुँचते ही सब उतर कर अपने-अपने स्थान को चले जाते हैं, तैसे ही कुटुम्ब के सभी लोग एक कुलरूपी नाव में एकत्रित हुए हैं और आयु पूर्ण होते ही अपने परिणामों के अनुसार गतियों में चले जाते हैं । जिस स्वामी, सेवक, पुत्र, स्त्री, भ्राताओं के आश्रित होकर जीना चाहते हैं, वे सभी आश्रय बादलों के समूह के समान अनित्य हैं, विनाशीक हैं ।

  सदासुखदासजी