संवाओ वि अणिच्चो पहियाणं पिण्डणं व छाहीए ।
पीदी वि अच्छिरागोव्व अणिच्चा सव्वजीवाणं॥1728॥
तरु-छाया में हुए इकट्ठे यात्री-सम परिजन सहवास ।
है अनित्य अरु प्रेम परस्पर चक्षु रंग-सम नश्वर जान॥1728॥
अन्वयार्थ : बन्धुजनों, मित्रों एवं परिवार के व्यक्तियों सहित बसना है, वह भी अनित्य है । जैसे मार्ग में पथिकजनों का समूह एक वृक्ष की छाया को प्राप्त होकर पश्चात् अपनेअप ने ग्राम को या अपने-अपने मार्ग को उठकर चले जाते हैं, पुन: कभी मिलना नहीं होता । तैसे ही कुटुम्बीजन, मित्रजन भी एक कुल में, एक गृह में आकर बसते हैं (आयु पूर्ण होते ही) अपने-अपने परिणामों के योग्य गति को चले जाते हैं, फिर पुन: नहीं मिलते हैं तथा सभी जनों की प्रीति भी नेत्रों की राग/ललाई के समान अनित्य है ।

  सदासुखदासजी