
रत्तिं एगम्मि दुमे सउणाणं पिण्डणं व संजोगो ।
परिवेसोव अणिच्चो इस्सरियाणाधाणारोग्गं॥1729॥
जैसे पक्षी एक वृक्ष पर मिलते वैसे मिले कुटुम्ब ।
आज्ञा धन आरोग्य आदि भी सूर्य-परिधि-सम रहे अनित्य॥1729॥
अन्वयार्थ : जैसे सूर्य अस्त होते ही एक वृक्ष पर अनेक पक्षी इकट्ठे होकर बसते हैं, उनका ऐसा परस्पर में संकेत नहीं है कि "अपन सभी को इस वृक्ष पर शामिल होना है", बिना संकेत के ही अनेक देशों से आकर इकट्ठे होते हैं और प्रात:काल अनेक देशों को गमन कर जाते हैं । तैसे ही संकेत बिना ही अनेक गतियों से आकर कुटुम्बियों का संयोग हुआ है, मरण को प्राप्त होते ही त्रस-स्थावरादि अनेक योनिस्थान को चले जाते हैं । जैसे चन्द्रमा-सूर्य का कुंडाला/ गोलाकार बिम्ब होकर नष्ट हो जाते हैं । वैसे ही ऐश्वर्य, आज्ञा, धन, निरोगपना नष्ट हो जाता है ।
सदासुखदासजी