इंदियसामग्गी वि अणिच्चा संझाव होइ जीवाणं ।
मज्झण्हं व णराणं जोव्वणमणवट्ठिदं लोए॥1730॥
सन्ध्याकाल-समान विनश्वर इन्द्रिय-विषय मधुर-विष जान ।
यौवन भी अनवस्थित जानो ज्यों मध्याह्न काल पहिचान॥1730॥
अन्वयार्थ : जीवों को इन्द्रियों की सामग्री भी संध्याकाल की लालिमा के समान अनित्य है । क्षणमात्र में नेत्र नष्ट होते ही अन्धा हो जाता है, कर्ण नष्ट होने से बधिर हो जाता है, जिह्वा थक जाती है, हस्त-पाद रुक जाते हैं । लोक में जैसे मध्याः की छाया ढल जाती है, तैसे मनुष्यों के यौवनपना भी स्थिर नहीं है ।

  सदासुखदासजी