
धावदि गिदिणदिसोदंव आउगं सव्वजीवलोगम्मि ।
सुकुमालदा वि हीयदि लोगे पुव्वण्हछाही व॥1732॥
पर्वत से गिरती नदिया-सम आयु वेग से बहती है ।
प्रातः की परछाई जैसी तन-कोमलता घटती है॥1732॥
अन्वयार्थ : समस्त जीवलोक की आयु ऐसे निरन्तर जाती है, जैसे पर्वत से नदी का प्रवाह दौडता है तथा देह की सुकुमारता भी वैसे ही नष्ट होती है, जैसे पूर्वाह्न काल की छाया क्षण में घटती जाती है ।
सदासुखदासजी