अवरण्हरुक्खछाही व अट्ठिदं वढ्ढदे जरा लोगे ।
रूवं पि णासइ लहुं जलेव लिहिदेल्लयं रूवं॥1733॥
ज्यों तरु-छाया सान्ध्यकाल में क्षण-क्षण घटती जाती है ।
किन्तु बुढ़ापा बढ़े रूप भी नीर-लेख-सम मिटता है॥1733॥
अन्वयार्थ : जैसे अपराह्न काल में वृक्ष की छाया अस्थिर है, बढती जाती है, तैसे ही जरा/बुढापा क्षण-क्षण में बढता जाता है । कैसी है जरा? जिसके आते ही जैसे जल में रचाब नाया गया किसी का रूप शीघ्र विनश जाता है, तैसे ही पुरुष-व्यक्ति का रूप शीघ्र विनश जाता है ।

  सदासुखदासजी