
तेओ वि इंदधणुतेजसण्णिहो होइ सव्वजीवाणं ।
दिट्ठपणट्ठा बुद्धी वि होइ मुक्काव जीवाणं॥1734॥
इन्द्रधनुष के रंगों जैसा देह-तेज क्षण-भंगुर है ।
और जीव की बुद्धि भी बिजली जैसी क्षण-भंगुर है॥1734॥
अन्वयार्थ : समस्त जीवों के शरीर का तेज/कांति वह इन्द्रधनुष के तेज-समान है । जैसे इन्द्रधनुष के अनेक रंगों का तेज प्रगट होकर क्षणमात्र में नष्ट हो जाता है, तैसे लोक में जीवों का तेज विनाशीक जानना । जीवों की बुद्धि बिजली के समान प्रगट होकर नष्ट हो जाती है ।
सदासुखदासजी