
अदिवडइ बलं खिप्पं रूवं धुलीकदंबरं छाए ।
वीचीव अद्धवं वीरियंपि लोगम्मि जीवाणं॥1735॥
यथा धूल में बनी आकृति वैसे जीवों का बल क्षीण ।
जल-तरंग-सम अध्रुव जानो सब जीवों का नश्वर वीर्य॥1735॥
अन्वयार्थ : जैसे नगर की गली में धूल से बनाया गया पुरुष का आकार नष्ट हो जाता है, तैसे ही यह बल भी शीघ्र पतन को प्राप्त होता हैऔर लोक में जीवों का वीर्य/बल भी जल लहरी के समान अस्थिर है ।
सदासुखदासजी