हिमणिचओ वि व गिहसयणासणभंडाणि होंति अधुवाणि ।
जसकित्ती वि अणिच्चा लोए संज्झब्भरागोव्व॥1736॥
घर, शय्या, आसन, बर्तन भी बर्फ समान विनश्वर हैं ।
नभ में सान्ध्य लालिमा जैसा यश भी अहो विनश्वर है॥1736॥
अन्वयार्थ : लोक में यशस्कीर्ति है, वह भी संध्या की ललाई समान विनाशीक है ।

  सदासुखदासजी