किह दा सत्ता कम्मवसत्ता सारदियमेहसरिसमिणं ।
ण मुणंति जगमणिच्चं मरणभयसमुत्थिया संता॥1737॥
ेकह दा सत्ता कम्मवसत्ता सारेदयमहिसपरसेमणं ।
ण मुणंेत जगमेणच्चं मरणभयसमुत्थिया संता॥1737॥
अन्वयार्थ : मरण के भय से व्याप्त होने पर और कर्म के वश से पीडित ऐसे संसारी प्राणी इस जगत को शरद ऋतु के मेघ समान अनित्य कैसे नहीं जानते? यहाँ और भी विशेष कहते हैं - इस जगत में जितने पदार्थ नेत्रों के गोचर-दिखते हैं, वे समस्त नाश को प्राप्त होंगे । शरीर रोगों से व्याप्त है, यौवन जरा से व्याप्त है, ऐश्वर्य विनाश से सहित है । इस संसार में बलभद्रनारायण का ऐश्वर्य भी क्षणमात्र में नष्ट हो गया, जब देवों द्वारा रची गई द्वारावती/द्वारिका नगरी नष्ट हो गई, तब अन्य की क्या कथा? लक्ष्मी विनाश से सहित जानना, जीवन मरणसहित है और स्त्री-पुत्र-मित्र-कुटुम्बादि के जितने संयोग हैं, उनका वियोग निश्चय से होगा ही । जैसे इन्द्रधनुष तथा बिजली का चमत्कार क्षणभंगुर है, तैसे ही समस्त संबंध क्षणभंगुर जानना । देह स्थिर नहीं रहेगी, बल-वीर्य नष्ट होंगे, इन्द्रियाँ विनाश को प्राप्त हांेगी, इसलिए जब तक इन्द्रियबल नष्ट नहीं होता और जरा देह को जर्जरित नहीं करती, तब तक परमधर्म में यत्न करके अपना हित कर लेना श्रेष्ठ है । बडे पुण्यवान चक्रवर्ती की लक्ष्मी भी स्थिर नहीं रहती तो अन्य रंकों की क्या कहना? अति बलवान भी मरण से रहित नहीं होता । अनेक प्रकार के भोजनों से पोषते-पोषते भी यह शरीर नष्ट होगा ही होगा । ये भोग काले नाग के फण समान भयंकर दुर्गति के दु:ख उपजाने वाले हैं, तो भी स्थिर नहीं हैं । यह देह, स्त्री, पुत्र, मित्र, बांधव अवश्य ही नष्ट होंगे; तो इनके लिये इस लोक में वृथा ही पापबंध करके नरक में जाना श्रेष्ठ नहीं । स्त्री-पुत्र-मित्रादि किसी के साथ परलोक में नहीं जाते, स्वयं उपार्जित शुभाशुभ कर्म ही साथी हैं, इसलिए अनित्य भावना भाओ । ये जाति, कुल, देश, नगर, देह के साथ ही इनका वियोग हो जायेगा, जाति-कुल में अपनापन किया; वह भी पर्याय के साथ ही विनाश को प्राप्त होगा । इस मनुष्य शरीर के द्वारा दोनों लोकों में कल्याणकारी कार्य करो, लक्ष्मी पर के उपकार के निमित्त लगाओ । यह लक्ष्मी कोई कुलवान में, रूपवान में, बलवान में, शूरवीर में, कृपण में, कायर में, अकुलीन में, पूज्य में, धर्मात्मा में, पराक्रमी में, अधर्मी में कहीं भी नहीं रमती है । यह तो पूर्वजन्म में जो पुण्य किया था, उससे प्राप्त हुई है और मद उत्पन्न करके, पापों में प्रवृत्ति कराके, दुर्गति को गमन कराने वाली है । इसलिए उत्तम, मध्यम, जघन्य पात्रों को दान देकर तथा सात क्षेत्रों में लगाकर सफल करो । तथा यौवन रूप पाकर दृढ शीलव्रत पालन करो । बल पाकर क्षमा ग्रहण करो । ऐश्वर्य पाकर मदरहित हो विनयवान होओ । संयोग पाकर वैराग्य भावना भाओ । ऐसी अनित्य भावना वर्णन की ।

  सदासुखदासजी