
णासदि मदो उदिण्णे कम्मेण य तस्स दीसदि उवाओ ।
अमदंपि विसं सच्छं तणं पि णीयं विहंुति अरी॥1738॥
कमाब की उदीरणा हो जब बुद्धि नष्ट हो, नहीं उपाय ।
अमृत विष, तृण शस्त्ररूप हो परिजन भी शत्रु हो जाय॥1738॥
अन्वयार्थ : अशुभ कर्म की उदीरणा/तीव्र उदय होने पर बुद्धि नष्ट होती है, कर्मोदय होने पर एक भी उपाय नहीं दिखता । अमृत भी वैरी/विष होकर परिणमता है । प्रबल उदय होने पर बुद्धि विपर्यय/विपरीत होकर आप ही अपने घातक कर्म करता है ।
सदासुखदासजी