मुक्खस्स वि होदि मदी कम्मोवसमे य दीसदि उवाओ ।
णीया अरी वि सच्छं वि तणं अमयं च होदि विसं॥1739॥
कमाब का उपशम1 होने पर बुद्धि प्रकटती बने उपाय ।
शत्रु मित्र हो शस्त्र तृण बने विष भी अमृतमय हो जाय॥1739॥
अन्वयार्थ : और जब अशुभकर्म का उपशम होता है, तब मूर्ख के भी तीव्र बुद्धि प्रगट हो जाती है और अनेक उपाय सुखकारी दिख जाते हैं । वैरी भी अपना मित्र हो जाता है, शस्त्र भी तृणसमान हो जाता है और विष भी अमृत रूप होकर परिणम जाता है, अशुभ कर्म का उपशम/शांत हो, जो उपद्रवकारी समस्त वस्तुएँ भी सुखकारक होकर परिणमती हैं ।

  सदासुखदासजी