पाओदएण अत्थो हत्थं पत्तो वि णस्सदि णरस्स ।
दूरादो वि सपुणस्स एदि अत्थो अयत्तेण॥1740॥
पापोदय हो तो पुरुषों के पास रहा धन होता नाश ।
पुण्योदय में बिना यत्न धन बहुत दूर से आता पास॥1740॥
अन्वयार्थ : इस जगत में मनुष्य के पाप के उदय से हाथ में आया हुआ धन भी नष्ट हो जाता है और पुण्यवान पुरुष को पुण्य कर्मोदय से बिना यत्न के ही अति दूर से भी धन आकर प्राप्त हो जाता है ।

  सदासुखदासजी