
पुण्णोदएण करसइ गुणे असंते वि होइ जसकित्ती ।
पाओदएण कस्सइ सुगुणस्स वि होइ जसधाओ॥1742॥
पुण्य-उदय से कीर्ति व्याप्त हो चाहे वह नर हो गुणहीन ।
पाप-उदय में अपयश फैले चाहे वह नर हो गुणशील॥1742॥
अन्वयार्थ : किसी में गुण नहीं होने पर भी पुण्य का उदय होने से जगत में यशस्कीर्ति ही प्रगट होती है और गुण सहित होते हुए भी पापकर्म के उदय से किसी के यश का नाश होकर अपयश ही प्रगट होता है ।
सदासुखदासजी