
जीवाण णत्थि कोई ताणं सरणं च जो हवेज्ज इधं ।
पायालमदिगदो वि य ण मुच्चदि सकम्मउदयम्मि॥1744॥
कोई न रक्षक होता है तब जिसकी शरणा प्राप्त करे ।
यदि प्रवेश पाताल करे पर कर्माेदय तो नहीं टले॥1744॥
अन्वयार्थ : उदय आने के बाद जिसका कोई इलाज नहीं ऐसे कर्म के फलरूप जन्म, जरा, मरण, रोग, चिंता, भय, वेदना, दु:ख को प्राप्त हुए जीवों की रक्षा करने वाला कोई शरण नहीं है । अपने बाँधे हुए कर्म के उदय से पाताल में भी छिप जाओ, पाताल में प्रविष्ट हो जाओ तो भी छूटने वाले नहीं हैं ।
सदासुखदासजी