गिरिकंदरं च अडवि सेलं भूमिं च उदधि लोगंतं ।
अदिगंतूणं वि जीवो ण मुच्चदि उदिण्णकम्मेण॥1745॥
गिरि कन्दरा शिखर या अटवी सागर या जाये लोकान्त ।
कर्माेदय को प्राप्त जीव का छूट न पाये कर्मकलंक॥1745॥
अन्वयार्थ : पर्वत की गुफा में, वन में, पर्वत में, भूमि में, समुद्र में, लोक के अंत में, मध्य में महाविषम स्थान को प्राप्त होने पर भी जीव के उदीरणा को प्राप्त हुए कर्म छोडते नहीं हैं ।

  सदासुखदासजी