
दुगचदुअणेयपाया परिसप्पादी य जंति भूमीओ ।
मच्छा जलम्मि पक्खी णभम्मि कम्मं तु सव्वथ॥1746॥
दोपाये चौपाये सर्पादिक प्राणी की गति भू पर ।
जलचर जल में पक्षी नभ में किन्तु कर्म पहुँचे सर्वत्र॥1746॥
अन्वयार्थ : द्विपद जो दुष्ट मनुष्यादि, चतुष्पद जो सिंह-व्याघ्रादि और भी अनेक पद जो अनेक प्रकार के तिर्यंच, सरीसर्पादि तो भूमि में ही गमन करते हैं और कच्छ-मत्स्यादि जल में ही गमन करते हैं, पक्षी आकाश में ही गमन करते हैं; परन्तु कर्म तो सर्वत्र जल में आकाश में गमन करते हैं, कहीं भी नहीं छोडते हैं ।
सदासुखदासजी