
रविचंदवादवेउव्वियाणमगमा वि अत्थि हु पदेसा ।
ण पुणो अत्थि पएसो अगमो कम्मस्स होइ इधं॥1747॥
सूर्य चन्द्रमा वायु और सुर से भी हैं अगम्य बहुदेश ।
किन्तु कर्म की गति न होवे एेसा कोई नहीं प्रदेश॥1747॥
अन्वयार्थ : इस लोक में ऐसे-ऐसे अगम्य प्रदेश हैं, जिनमें सूर्य-चन्द्र का उद्योत तथा किरणें प्रवेश नहीं कर सकतीं और वैक्रियिक ऋद्धिधारी ही का गमन प्रवेश है; परन्तु ऐसा कोई प्रदेश नहीं, जहाँ कर्म का गमन न हो ।
सदासुखदासजी