
विज्जोसहमंतबलं बलवीरिय णीयायहत्थिरहजोहा ।
सामादिउवाया वा ण होंति कम्मोदए सरणं॥1748॥
कर्माेदय होने पर औषधि विद्या मन्त्र तथा बल-वीर्य ।
हाथी, घोड़े, साम, दाम अरु दण्ड भेद भी शरण नहीं॥1748॥
अन्वयार्थ : कर्म का उदय होने पर विद्या, औषध, मंत्र, बल, वीर्य और निज मित्रादि, घोडे, हाथी, रथ, योद्धा तथा साम, दाम, दंड, भेदादि कोई उपाय शरण नहीं है ।
सदासुखदासजी