जह आइच्चमुदेंतं कोई वारंतउ जगे णत्थि ।
तह कम्ममुदीरंतं कोई वारेंतउ जगे णत्थि॥1749॥
जैसे रवि को उदयाचल पर जाने से नहिं रोक सके ।
वैसे कर्म-उदय में आने से कोई नहिं रोक सके॥1749॥
अन्वयार्थ : जैसे आकाश में उदित हुए सूर्य को रोकने वाला जगत में कोई नहीं है, तैसे ही उदीरणा/तीव्र उदय को प्राप्त हुए कर्म को कोई रोकने वाला नहीं है । कर्म के सहकारी कारण बाह्य निमित्त मिल जाने के बाद कर्म के उदय को रोकने में कोई देव, दानव, मनुष्यादि समर्थ नहीं है ।

  सदासुखदासजी