विज्जाहरा य वलदेववासुदेवा य चक्कवट्टी वा ।
देविंदा व ण सरणं कस्सइ कम्मोदए होंति॥1752॥
कर्माेदय होने पर विद्याधर बलभद्र नरेन्द्र सुरेन्द्र ।
महाबली अरु पराक्रमी भी शरण नहीं दे सकें कभी॥1752॥
अन्वयार्थ : अशुभ कर्म का उपशम हो और पुण्यकर्म का उदय हो, तब सभी रक्षक हो जाते हैं ।

  सदासुखदासजी