वोल्लेज्ज चंकमंतो भूमिं उदधिं तरिज्ज पवमाणो ।
ण पुणो तीरदि कम्मस्स फलमुदिण्णस्स बोलेदुं॥1753॥
चलकर प्राणी भूमि लाँघ ले और तैरकर सागर पार ।
उदयागत कमाब के फल का महाबली नहिं पावें पार॥1753॥
अन्वयार्थ : गमन करने वाला मानव भूमि का उल्लंघन कर सकता है और तिरने वाला मनुष्य समुद्र का उल्लंघन कर सकता है, परंतु उदीरणा को प्राप्त कर्म के फल का उल्लंघन करने में कोई भी समर्थ नहीं होता ।

  सदासुखदासजी