
दंसणणाणचरित्तं तवो य ताणं च होइ सरणं च ।
जीवस्स कम्मणासणहेदुं कम्मे उदिण्णम्मि॥1755॥
कर्माेदय के समय जीव को कर्म नाश के हेतु कहे ।
सम्यग्दर्शन ज्ञान चरण तप ही रक्षा करने वाले॥1755॥
अन्वयार्थ : इस जीव के कर्म की उदीरणा होने पर उनका नाश करने के लिए दर्शन, ज्ञान, चारित्र, तप ही रक्षक - शरण होते हैं, अन्य कोई शरण नहीं है । जब इस संसार में स्वर्गलोक के इन्द्र भी मरण को प्राप्त हो जाते हैं, तब अन्य की क्या बात करना? जब अणिमादि ऋद्धियों के धारक समस्त स्वर्ग के असंख्यात देव मिल करके भी अपने स्वामी इन्द्र की रक्षा नहीं कर सकते, तब अन्य अधम व्यंतरादि देव ग्रह, यक्ष, भूत, योगिनी, क्षेत्रपाल, चंडी, भवानी इत्यादि असमर्थ देव, जीव की रक्षा करने में कैसे समर्थ होंगे? यदि मनुष्यों की रक्षा करने में कुलदेव, मंत्र, तंत्र, क्षेत्रपालादि समर्थ होते तो जगत में मनुष्य अक्षय - शाश्वत हो जायें । जो अपनी रक्षा करने में शरणरूप ग्रह, भूत, पिशाच, योगिनी, यक्षों को मानते हैं, वे दृढ मिथ्यात्व से मोहित हैं; क्योंकि आयु का क्षय होने से मरण होगा ही, आयु देने में कोई देव- दानव समर्थ नहीं है, अत: मरण से रक्षा करने में कोई को कोई सहायी मानता है, वह मिथ्यादर्शन का प्रभाव है । यदि देव ही मनुष्यों की रक्षा करने में समर्थ हों तो स्वयं देवलोक को क्यों छोडते हैं/क्यों मरते हैं? इसलिए परम श्रद्धान करके ज्ञान, दर्शन, चारित्र, तप का परम शरण ग्रहण करो । संसार में भ्रमण करते हुए जीवों को कोई शरण नहीं है । इस जगत में उत्तम क्षमादिरूप अपने आत्मा रूप परिणमन ही आपका रक्षक होता है और क्रोध, मान, माया, लोभरूप परिणमन करके अपने आपका घात करता है । इसलिए अपना रक्षक और नाशक आप स्वयं ही हैं । इसप्रकार अशरण भावना का वर्णन किया ।
सदासुखदासजी