
पावं करेदि जीवो बंधवहेदुं सरीरहेदुं च ।
णिरयादिसु तस्स फलं एक्को सो चेव वेदेदि॥1756॥
तन अथवा परिजन के पोषण हेतु जीव करता है पाप ।
नरकादिक में फल भोगे वह मात्र अकेला अपने आप॥1756॥
अन्वयार्थ : यह जीव बांधव, कुटुम्बादि के लिये तथा शरीर का पालन पोषण के निमित्त पापकर्म करता है । बहुत आरम्भ-परिग्रह में लीन होकर ऐसा पापबंध करता है, उसका फल नरकादि कुगतियों में अकेला ही महादु:ख को भोगता है ।
सदासुखदासजी