रोगादिवेदणाओ वेदयमाणस्स णिययकम्मफलं ।
पेच्छंता वि समक्खं किंचिवि ण करंति से णियया॥1757॥
स्वयं किये कमाब के फल में रोगादिक दुःख भोगे जीव ।
इष्ट मित्र परिजन सब देखें किन्तु कर सकें नहिं कुछ भी॥1757॥
अन्वयार्थ : अपने कर्म का फल रोगादि की वेदना, उसे जीव भोगता है और अपने निज मित्र, कुटुम्बादि प्रत्यक्ष देखते हुए भी किंचित् दु:ख दूर नहीं कर सकते हैं । तो परलोक में कौन सहायी होगा? अकेला ही नरकादि में कर्म का फल भोगेगा ।

  सदासुखदासजी