
तह मरइ एक्कओ चेव तस्स ण विदिज्जगो हवइ कोई ।
भोगे भोत्तुं णियया विदिज्जया ण पुण कम्मफलं॥1758॥
जीव अकेला मरण प्राप्त हो कोई नहीं जा सकता साथ ।
भोगों में तो सब साथी हों किन्तु कर्मफल में नहिं साथ॥1758॥
अन्वयार्थ : अपनी आयु पूर्ण होते ही अकेला ही मरण को प्राप्त होता है । मरण को रोककर, मरण से रक्षा करने वाले अन्य कोई सहायक नहीं होते हैं । भोगों को भोगने के लिए कुटुम्ब के स्त्री, पुत्र, मित्रादि साथी हो जाते हैं, लेकिन अशुभ कर्म के फल भोगने में कोई अपना सहायक नहीं होता है ।
सदासुखदासजी