णीया अत्था देहादिया य संगा ण कस्स इह होंति ।
परलोगं अण्णेत्ता जदि वि दइज्जंति ते सुट्ठु॥1759॥
तन धन और स्वजन आदिक को सर्वाधिक चाहे यह जीव ।
किन्तु जाए जब पर-भव में यह कोई जाता साथ नहीं॥1759॥
अन्वयार्थ : परलोक को जाते समय इस जीव के स्त्री, पुत्र, मित्र, धन, देहादि परिग्रह कोई भी अपना नहीं होता । यद्यपि ये स्त्री-पुत्रादि आपको बहुत चाहते हैं, संबंध की बहुत अधिक वांछा रखते हैं, तथापि सब निरर्थक है ।

  सदासुखदासजी