
इहलोगबंधवा ते णियया ण परम्मि होंति लोगम्मि ।
तह चेव धणं देहो संगा सयणासणादीयं॥1760॥
इस भव में जो स्वजन बन्धुजन पर-भव में वे मिलें नहीं ।
तन धन शय्या आसन परिग्रह भी पर-भव में मिले नहीं॥1760॥
अन्वयार्थ : इस लोक में जो बांधव, मित्रादि हैं; वे परलोक में बांधव, मित्रादि नहीं होंगे । वैसे ही धन, शरीर, परिग्रह, शय्या, आसन, महल, मकान, परलोक में अपने नहीं होंगे । इस देह का नाश होते ही इस देह संबंधी समस्त संबंध छूट जायेंगे । परलोक में स्त्री, पुत्र, मित्र, सेवकादि संबंधी कोई संबंध जोडने नहीं जायेंगे । महल, मकान, राज्य, संपदा का संबंध यहाँ ही है । पुण्य-पाप को लेकर अकेला परभव को जाता है । इसलिए संबंधियों से ममता करके परलोक बिगाडना महान अनर्थ है ।
सदासुखदासजी