जो पुण धम्मो जीवेण कदो सम्मत्तचरणसुदमइओ ।
सोे परलोए जीवस्स होइ गुणकारकसहाओ॥1761॥
किन्तु जीव यदि सम्यग्दर्शन ज्ञान चरणमय धर्म करे ।
वही सहायक हो पर-भव में और वही सुखदायक हो॥1761॥
अन्वयार्थ : जिस जीव ने सम्यक्त्व-चारित्र श्रुतज्ञान का अभ्यासमय धर्म किया है, वह ही जीव के परलोक के गुणकार सहायी होगा । इस धर्म बिना कोई ही अपना सहायी - हितु नहीं है । धर्म की सहायता से स्वर्ग के महर्द्धिक देव, अहमिंद्रपना, इन्द्रपना, तीर्थंकरपना, चक्रीपना, सुन्दर कुल, जाति, रूप, बल, विद्या, जगत में पूज्यता - ये सभी धर्म के प्रसाद से प्राप्त होते हैं ।

  सदासुखदासजी