बद्धस्स बंधणे व ण रागो देहम्मि होइ णाणिस्स ।
विससरिसेसु ण रागो अत्थेसु महब्भयेसु तहा॥1762॥
जैसे बँधे पुरुष को बेड़ी से होता है राग नहीं ।
त्यों ज्ञानी को तन में अरु इन्द्रिय विषयों में राग नहीं॥1762॥
अन्वयार्थ : जैसे बंधन से बँधे पुुरुष को बंधन में - बंदीगृह में राग नहीं होता, तैसे ही संसार में अनन्त बार मरण कराने वाले तथा महाभय के कारण इसलिए विषसमान धन-संपदाप रिग्रहादि में ज्ञानी के राग नहीं होता । अनंत दु:खों से भरे संसाररूप वन में यह जीव अकेला ही परिभ्रमण करता है तथा अपने भावों से उत्पन्न किये कर्म का फल चतुर्गति में एकाकी भोगता है । एकाकी नरक में जाता है और अकेला ही अपने संकल्प के अनुसार उत्पन्न स्वर्ग के दिव्य सुखरूप अमृत को अनुभवता है । संयोग में, वियोग में, जन्म में मरण में, सुख में, दु:ख में कोई इस जीव का मित्र नहीं है । अपना किया हुआ स्वयं अकेला ही भोगता है । जो धन, स्त्री, पुत्र, मित्र, कुटुम्बादि के लिये निंद्यकर्म करता है, उनका फल नरकादि गतियों में स्वयं अकेला ही भोगता है । इसके धनादि को भोगने में सहायी साथी होते हैं, परंतु पाप कर्म से उत्पन्न हुए कष्ट उनको भोगने में कोई साथी - सहयोगी नहीं होते । इसलिए भो आत्मन्! अपने एकत्व को क्यों नहीं देखते हो? जन्म-मरणादि के दु:ख प्रत्यक्ष अनुभव में आ रहे हैं और जो मोह से चेतन-अचेतन पदार्थ में अपना-एकत्व मानता है, वह अपने आत्मा को दृढ कर्मों से अपनी भूल से बाँधता है । जब भ्रम रहित होता हुआ अपने एकत्व का अवलोकन करेगा, उसी समय कर्मबन्ध का अभाव करके शुद्धस्वरूप को प्राप्त होगा तथा अपने स्वरूप को भूलने से जिसके ज्ञाननेत्र मुद्रित/ बंद हो गये, वह कर्म के वश पडा हुआ दीर्घ काल तक संसार में परिभ्रमण करता है । अकेला ही उत्पन्न होता है, अकेला ही नाश को प्राप्त होता है, अकेला ही गर्भ के दु:ख भोगता है, अकेला ही निर्धनपना, बालपना, वृद्धपना, नीचपना - सभी कुछ भोगता है । समस्त स्वजन देखते रहते हैं; फिर भी कोई दु:ख का लेश भी नहीं बाँट सकता है । ऐसा जानता हुआ भी मूर्ख देह-कुटुम्बादि में ममत्व नहीं छोडता । इस जीव का रक्षक - सहायी एक दशलक्षण धर्म जानना, अन्य नहीं । इसप्रकार एकत्व भावना का वर्णन किया ।

  सदासुखदासजी