+ अब अन्यत्व भावना चौदह गाथाओं में कहते हैं - -
किहदा जीवो अण्णो अण्णं सोयदि हु दुक्खियं णीयं ।
ण य बहुदुक्खपुरक्कडमप्पाणं सोयदि अबुद्धी॥1763॥
ेकहदा जीवाि अण्णाि अण्णं सायिेद हु दुक्खियं णीयं ।
ण य बहुदुक्खिुरक्कडमप्िाणं सायिेद अबुद्धी॥1763॥
अन्वयार्थ : पर पदार्थ से भिन्न यह जीव अपनी जाति के लोगों एवं कुटुम्बी जनों को दुखी देखकर शोक/सोच करता है, परंतु स्वयं दुखी है, उसका शोक/सोच नहीं करता कि मैंने अनादिकाल से शारीरिक ऐर मानसिक अनंत दु:ख भोगे और भविष्य में द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव के कारण और असातावेदनीय कर्म का उदय आने पर अनंतकाल तक अनंत दु:ख भोगूँगा । मेरा दु:ख दूर होने का क्या इलाज है?

  सदासुखदासजी