
संसारम्मि अणंते सगेण कम्मेण हीरमाणाणं ।
को कस्स होेइ सयणो सज्जइ मोहा जणम्मि जणो॥1764॥
सभी जीव संसार विपिन में निज कमाब से घूम रहे ।
कहो कौन किसका है इसमें मोही पर को निज माने॥1764॥
अन्वयार्थ : पंच परावर्तनरूप अनंत संसार में अपने कर्म के वश परिभ्रमण करते हुए अनेक जीवों में से कोई भी इसका स्वजन नहीं है । मोह जो मिथ्यात्व भाव, उससे लोकों में यह आसक्त हो रहा है । यह मेरा पुत्र है, भ्राता है, स्त्री है, मित्र है, स्वामी है, सेवक है; परंतु कोई किसी का नहीं, सभी अन्य-अन्य हैं । समस्त संबंध कर्म जनित हैं, विषय-कषाय को पुष्ट करने वाले हैं ।
सदासुखदासजी