रत्तिं रत्तिं रुक्खे रुक्खे जह सउणयाण संगमणं ।
जादीए जादीए जणस्स तह संगमो होई॥1766॥
ज्यों निशि में प्रत्येक वृक्ष पर पक्षी एकत्रित होते ।
जन्म-जन्म में सभी जीव वैसे ही एकत्रित होते॥1766॥
अन्वयार्थ : जैसे रात्रि में पक्षी वृक्ष के आश्रय बिना रहने में असमर्थ हैं, अपने योग्य वृक्ष को प्राप्त करके रात्रि व्यतीत करके प्रात: होते ही सब देशांतर को गमन कर जाते हैं; तैसे ही संसारी प्राणी भी आयु के समस्त निषेक खिर जाने पर पूर्व शरीर को त्याग अन्य शरीर को ग्रहण कर नये-नये स्वजन संबंधियों को ग्रहण करते हैं ।

  सदासुखदासजी