पहिया उवासये जह तहिं तहिं अल्लियंति ते य पुणो ।
छंडित्ता जंति णरा तह णीयसमागमा सव्वे॥1767॥
जहाँ तहाँ से यात्री आकर यात्री-गृह में लें विश्राम ।
पुनः छोड़ जाते वैसे ही सब जन का है क्षणिक मिलन॥1767॥
अन्वयार्थ : जैसे अनेक देश, ग्राम, नगर के निवासी पथिकजन एक आश्रम स्थान में आकर रात्रि में बसते हैं, पश्चात् प्रात:काल आश्रम को त्यागकर अनेक देशों को गमन करते हैं, तैसे ही अनेक योनियों से आये प्राणी एककुल रूप आश्रम में शामिल होते हैं, बाद में अपनीअप नी आयु पूर्ण करके अनेक गतियों को प्राप्त होते हैं ।

  सदासुखदासजी