भिण्णपयडिम्मि लोए को कस्स सभावदो पिओ होज्ज ।
कज्जं पडि संबंधं वालुयमुठ्ठीव जगमिणमो॥1768॥
सब जीवों की प्रकृति भिन्न है किसका चाहे कौन स्वभाव ।
सभी स्वार्थ के साथी जग में रिश्ते मुट्ठी-रेत समान॥1768॥
अन्वयार्थ : भिन्न-भिन्न प्रकृति के धारक लोक उनमें किसको, किसका स्वभाव प्रिय होता है? अनेक स्वभाव रूप लोगों में एक-दूसरे का स्वभाव मिले बिना प्रीति होती नहीं और स्वभाव मिलते नहीं । अनेक जीवों के अनेक प्रकार के भिन्न-भिन्न स्वभाव हैं । इसलिए कोई भी किसी को प्रिय नहीं होता । सभी जीवों को प्रयोजन सिद्ध करने जितना संबंध है, कार्य हो जाने तक संबंध है, काम न हो तो कोई किसी से प्रीति का संबंध नहीं करता । यह लोक बालू-रेत की मुट्ठी के समान संबंध को प्राप्त हो रहा है । जैसे भिन्न-भिन्न हैं स्वभाव जिनके, ऐसे बालू- रेत के कण जलादि द्रवित रूप द्रव्य के मिलाप से संबंध को प्राप्त होते हैं और जब जलादि द्रव्य का संयोग दूर हो जाता है, तब रेत के कण भिन्न-भिन्न होकर बिखर जाते हैं । तैसे ही संसारी जीव भी अपना-अपना मतलब - कार्य सधता जाने तो प्रीति करते हैं । जिससे अपना कुछ भी कार्य सधता नहीं दिखता, उससे प्रीति नहीं करते । अपना अभिमान जिससे बढेगा, ऐसा जानेगा तो प्रीति करता है तथा धन के लिये, धनवानों से आदर पाने के लिये, अपनी प्रसिद्धि - ख्याति के लिये किसी वस्तु के लाभ के लिये या अपनी बढाई के लिये, मेरा पूज्यपना जगत में हो, बिना काम के किसी को स्वभाव से प्रीति नहीं होती, सभी अन्य-अन्य हैं, किसी का संबंधी कोई है ही नहीं । ऐसा निश्चय करके पर की प्रीति त्याग कर अपने आत्महित में प्रीति करना उचित है ।

  सदासुखदासजी