पं-सदासुखदासजी
होऊण अरी वि पुणो मित्तं उवकारकारणा होइ ।
पुत्तो वि खणेण अरी जायदि अवकारकरणेण॥1770॥
करने से उपकार शत्रु भी पुनः मित्र हो जाता है ।
यदि अपकार करें तो क्षण में पुत्र शत्रु हो जाता है॥1770॥
सदासुखदासजी