तह्मा ण कोइ कस्सइ सयणो व जणो व अत्थि संसारे ।
कज्जं पडि हुंति जगे णीया व अरी व जीवाणं॥1771॥
अतः न जग में कोई किसी का शत्रु नहीं है अथवा मित्र ।
अपने-अपने स्वार्थ भाव से होते हैं सब शत्रु-मित्र॥1771॥
अन्वयार्थ : पहले जो शत्रु था, उसका उपकार करने से मित्र बन जाता है अर्थात् जिसका दान, सन्मानादि करेगा, वह शत्रु भी अपना अत्यंत प्रिय मित्र हो जाता है । और स्वयं के पुत्र को वांछित भोगों से रोकने से, अपमान, तिरस्कारादि करने से क्षणमात्र में अपना शत्रु हो जाता है । इसलिए कोई व्यक्ति संसार में किसी का न मित्र है, न शत्रु है । कार्य से ही शत्रुतामि त्रता प्रगट होती है । स्वजनपना, परजनपना, शत्रु-मित्रपना जीवों के स्वभाव से नहीं हैं, उपकार-अपकार की अपेक्षा मित्रपना-शत्रुपना जानना, क्योंकि जगत के जीव विषय-कषाय के वशीभूत हैं । जिनसे अपने पंचेन्द्रियों के विषय पुष्ट होते जाने, अपना अभिमान सधता जाने, परिग्रह की, धन की वृृद्धि होती जानता है, उनको तो मित्र जानता है और जिससे अपने विषयों में विघ्न-रुकावट होती जाने, बिगडते जाने, अभिमान घटता/ठेस पहुँचती जाने, उनको वैरी जानकर तीव्र वैर करता है । वास्तव में कोई शत्रु-मित्र है नहीं, इसलिए किसी में भी राग-द्वेष करना उचित नहीं है ।

  सदासुखदासजी