
जो जस्स वट्टदि हिदे पुरिसो सो तस्स बंधवो होदि ।
जो जस्स कुणदि अहिदं सो तस्स रिवृत्ति णायव्वो॥1772॥
जो जिसका हित करता है वह उसका बन्धु हो जाता ।
और करे यदि कोई अहित तो उसका शत्रु हो जाता॥1772॥
अन्वयार्थ : जिसके हित में, उपकार में जो प्रवर्तता है, वह उसका बांधव है और जो जिसका अहित करे, वह उसका वैरी है - ऐसी जगत की प्रवृत्ति है । अब वीतरागी गुरुबांधवों में शत्रुपना दिखाते हैं ।
सदासुखदासजी