पं-सदासुखदासजी
णीया करंति विग्घं मोक्खब्भुदयावहस्स धम्मस्स ।
कारिंति य अइबहुगं असंजमं तिव्वदुक्खकरं॥1773॥
जगत्-बन्धु तो मुक्ति प्रदायक धर्म-मार्ग में विघ्न करंें ।
और तीव्र दुःखकार असंयम पथ पर चलने को प्रेरें॥1773॥
सदासुखदासजी