
णीया सत्तू पुरिसस्स हुंति जदिधम्मविग्घकरणेण ।
कारेंति य अतिबहुगं असंजमं तिव्वदु:खयरं॥1774॥
मुनि-दीक्षा लेने में विघ्न करें तो बन्धु शत्रु-समान ।
और करावे दुःखद असंयम इसीलिए वे शत्रु-समान॥1774॥
अन्वयार्थ : जो अपने निज हैं, वे भी शत्रु हैं । पुरुष के धर्म में विघ्न कराकर और अति दु:ख देने वाला असंयम को कराकर अपने निज बांधव पुत्र-मित्रादि ने शत्रुपना ही प्रगट किया । इसके सिवाय अन्य शत्रुपना क्या होता है?
सदासुखदासजी