पुरिसस्स पुणो साधु उज्जोगं संजणंति जदिधम्मे ।
तध तिव्वदुक्खकरणं असंजमं परिहरावेंति॥1775॥
किन्तु साधुजन दीक्षा लेने हेतु जगाते हैं पुरुषार्थ ।
और तीव्र दुःखदायक अव्रत भावों का करवायें त्याग॥1775॥

  सदासुखदासजी