अण्णं गिण्हदि देहं तं पुण मुत्तूण गिण्हदे अण्णंश ।
घडिजंतं व य जीवो भमदि इमो दव्वसंसारे॥1782॥
एक देह को छोड़ दूसरी देह ग्रहण करता यह जीव ।
द्रव्य परावर्तन करता यह घटीयन्त्रवत् भ्रमे सदीव॥1782॥
अन्वयार्थ : इस जीव ने एक देह ग्रहण की, उसे छोडकर पुन: अन्य देह को ग्रहण करता है । जैसे अरहट में घटीयंत्र रीता/खाली होता है और फिर भर जाता है । फिर खाली हो जाता है और पुन: भर जाता है । तैसे ही द्रव्य संसार में एक देह को त्यागकर अन्य देह को ग्रहण करता है, अन्य को त्याग कर फिर अन्य को ग्रहण करता है । ऐसे नवीन-नवीन देह ग्रहण करता है और त्यागता है । ऐसे अनन्तानन्त काल में अनन्तानन्त देह ग्रहण किये हैं और छोडे हैं ।

  सदासुखदासजी