दं
जीवो संसारमावण्णो॥1783॥
जैसे रंगभूमि में आकर विविध भाँति अस्थिर रंगरूप ।
धारण करता नट वैसे ही भव-भव भ्रमण करे यह जीव॥1783॥
अन्वयार्थ : संसार-भ्रमण करता हुआ यह नृत्य के अखाडे को प्राप्त होकर नट के/नृत्यकार के समान अनेक प्रकार संस्थान, वर्णरूप स्थिरतारहित निरन्तर ग्रहण करता है और छोडता है ।

  सदासुखदासजी