अठ्ठपदेसे मुत्तूण इमो सेसेसु सगपदेसेसु ।
तत्तंपि व अद्धहणं उव्वत्तणपरत्तणं कुणदि॥1786॥
लोक मध्य के आठ प्रदेश छोड़कर सर्व प्रदेशों में ।
तप्त नीर में पड़े चावलों वत् ऊँचा-नीचा होता॥1786॥
अन्वयार्थ : यह जीव मध्य के आठ प्रदेशों को छोडकर शेष अपने आत्मप्रदेशों में गर्म जलरूप अधन/उबलते हुए पानी के मध्य में चावल के समान उद्वर्तन परावर्तन करता चला आ रहा है ।

  सदासुखदासजी